स्मार्ट सिटी: पहले 20 शहरों के लिए एक साल बचा, 35% काम शुरू नहीं, 12% के टेंडर नहीं


नई दिल्ली (धर्मेन्द्र सिंह भदौरिया).एक फरवरी को अपने बजट भाषण में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पांच नई स्मार्ट सिटी पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मोड पर बनाने की घोषणा की है। वित्त मंत्री की घोषणा के साथ ही मोदी सरकार की सबसे महत्वाकांक्षी योजना- 100 स्मार्ट सिटी एक बार फिर चर्चा में आ गई है। 25 जून 2015 में लॉन्च हुए स्मार्ट सिटी मिशन में 100 शहरों का चयन जून 2018 तक हुअा। योजना के मुताबिक शहर विशेष की घोषणा होने के दिन से अगले पांच वर्ष में स्मार्ट सिटी बनकर तैयार होनी थी, लेकिन जनवरी 2020 तक सिर्फ 12 फीसदी कार्य ही पूरा हो पाया है। चार चरणों में शहरों की घोषणा हुई। पहले चरण में 20 शहरों की घोषणा जनवरी 2016 में हुई। लेकिन जनवरी 2020 के अंत तक इन शहरों में 35 फीसदी काम शुरू भी नहीं हो पाया और 12 फीसदी प्रोजेक्ट के टेंडर भी जारी नहीं हो पाए।इन सौ शहरों में कुल 5151 परियोजनाएं पूरी होनी हैं, लेकिन पांच फरवरी तक 4,497 प्रोजेक्ट के टेंडर हो चुके थे, यानी कि स्मार्ट शहरों की घोषणा से अब तक की औसत आयु करीब 3.2 वर्ष होने के बावजूद 654 प्रोजेक्ट के टेंडर ही नहीं हुए। जबकि 1,556 प्रोजेक्ट पूरे हो गए हैं।
18 महीनों के दौरान स्मार्ट सिटी का कार्य तेजी से हुआ
केंद्र सरकार ने भी स्मार्ट शहरों के लिए 48 हजार करोड़ रुपए देने का वादा किया है जिसमें से दिसंबर 2019 तक 18,600 करोड़ रुपए से अधिक दिए गए हैं। हाउसिंग एंड अर्बन अफेयर्स मिनिस्ट्री के संयुक्त सचिव और स्मार्ट सिटी मिशन डायरेक्टर कुणाल कुमार कहते हैं कि बीते 18 महीनों के दौरान स्मार्ट सिटी का कार्य तेजी से हुआ है। इस दौरान इस दौरान टेंडर जारी करने की रफ्तार 223 फीसदी अधिक रही। 285 फीसदी से ज्यादा प्रोजेक्ट का कार्य शुरू हो चुका है जबकि कार्य पूर्ण होने के प्रतिशत में तेजी 387 फीसदी की रही। ब्रिटिश सरकार के डिपार्टमेंट फॉर इंटरनेशनल डवलपमेंट के इंफ्रास्ट्रक्चर सीनियर एडवाइजर जगन शाह ने कहा कि स्मार्ट सिटी में कार्य में देरी का मुख्य कारण एसपीवी (स्पेशल परपस व्हीकल) बनाना रहा। यह बनाना इसलिए आवश्यक था क्योंकि फंड इसी में आना था। यह बनाने में ही करीब-करीब हर शहर को दो वर्ष का समय लगा। देरी के कारण शहर के आम लोगों की सहभागिता कम हुई। शहरों की घोषणा होने के पांच वर्ष में यह पूरे होने थे लेकिन एक भी शहर इस तय समय में पूरी तरह स्मार्ट हो पाने की उम्मीद नहीं है। इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट कब तक पूरे होंगे कहा नहीं जा सकता। शहर का चुनिंदा इलाका ही स्मार्ट किया जा रहा है। बंगाल के प्रोजेक्ट के बाहर होने से अब शहरों की संख्या भी 100 नहीं रह गई है।
स्थानीय निकाय के पास पैसा होते हुए काम नहीं हो पा रहा
देरी के अन्य कारणों पर चर्चा करते हुए अर्बन इंस्टीट्यूट ऑफ अर्बन अफेयर्स की प्रोफेसर डिबोलिना कुंडू कहती हैं कि स्थानीय निकाय के पास पैसा होने के बावजूद कार्य नहीं हो पा रहे हैं, इसका प्रमुख कारण है कि स्थानीय स्तर पर कार्य करने वाले ट्रेंड लोग नहीं है। इस कारण भी कार्यों में देरी हो रही है। इसके अतिरिक्त 35 फीसदी के शुरुआती निजी निवेश के लक्ष्य की तुलना में पूंजी निवेश भी नहीं आया है।
वहीं दूसरी ओर डिपार्टमेंट फॉर प्रमोशन ऑफ इंडस्ट्री एंड इंटरनल ट्रेड (डीपीआईआईटी) पांच नए शहरों की योजना पर आवास एवं शहरी विकास मंत्रालय के साथ कार्य कर रहा है। सूत्रों के मुताबिक नये शहर गांधीनगर के पास बसी गिफ्ट सिटी या स्पेशल इकोनाॅमिक जोन (सेज) की तर्ज पर निवेश हब के रूप में विकसित किए जाएंगे। दोनों ही मंत्रालय योजना पर तेजी से कार्य कर रहे हैं।

छत्तीसगढ़ में फंड का 50% खर्च, चुनाव आए तो टेंडर निकाले
रायपुर स्मार्ट सिटी के लिए केंद्र, राज्य सरकार से मिले करीब 400 करोड़ रु. फंड में से अभी तक 50% ही खर्च हुआ है। मिशन के तहत 38 करोड़ रुपए में कुल 20 प्रोजेक्ट पूरे हुए हैं। 283.85 करोड़ के 15 काम चल रहे हैं। राज्य में होने वाले नगरीय चुनाव से पहले नवंबर में एक साथ 192 करोड़ के 22 टेंडर निकाले गए। नया रायपुर को भी स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट में लिया गया है। पहली बार जनवरी में 200 करोड़ रुपए मिले हैं।
मध्यप्रदेश में भोपाल ने अवॉर्ड जीता पर लोगों को लाभ नहीं
योगेश पांडे, भोपाल। प्रदेश की 7 स्मार्ट सिटी पर अब तक 1,760 करोड़ रु. खर्च हुए हैं। दो माह पहले ही भोपाल को बेस्ट स्मार्ट सिटी का अवॉर्ड मिला है। यहां इंटीग्रेटेड कंट्रोल एंड कमांड सेंटर से कचरा गाड़ियों, फायर ब्रिगेड, स्ट्रीट लाइट जैसी 27 तरह की सेवाओं की आॅनलाइन माॅनिटरिंग हो रही है। यह सिर्फ कागजों पर है। हकीकत ये है कि शहर के कई हिस्सों में दो-दो दिन तक कचरा उठाने वाली गाड़ियां नहीं पहुंचतीं। कई सड़कों पर अंधेरा है।
शिमला में टेंडर प्रक्रिया ही अभी अधूरी
हिमाचल प्रदेश के शिमला में, स्मार्ट सिटी के छाेटे प्राेजेक्ट शुरू हाेने हैं जिनके लिए 28 फरवरी तक टेंडर प्राेसेस पूरा हाे जाएगा। केंद्र से 100 कराेड़ की ग्रांट मिल चुकी है। अभी तक कंसल्टेट हायर करने अाैर एस्टीमेट तैयार करने का काम पूरा िकया गया है। मार्च माह से जमीनी स्तर पर काम शुरू हाेना है जिसके लिए विभिन्न विभागाें के साथ लगातार बैठकें की जा रही है। स्मार्ट सिटी में शहर के तंग राेड़ काे चाैड़ा िकया जाना है। इसमें बालूगंज अाैर छाेटा शिमला राेड़ काे प्राथमकिता से लिया गया है। वहीं धर्मशाला स्मार्ट सिटी योजना के तहत 34 करोड़ रुपए की परियोजनाओं को निष्पादित किया गया है। 58 करोड़ रुपएकी परियोजनाओं पर कार्य चल रहा है और पिछले तीन वर्षों मेंपरियोजना पर स्थापना व्यय के रूप में 9.78 करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं। अंडर ग्राउंड डस्टबिन का प्रोजेक्ट जिसके तहत 70 चिन्हित स्थानों पर इन्हें लगाया जाना है लेकिन संबंधित कंपनी की धर्मशाला नगर निगम में पूर्व में लगाए अंडर ग्राउंड डस्टबिन की पेमेंट समय पर न होने चलते यह प्रोजेक्ट अभी धीमी गति से चल रहा है।
नागपुर में 1045 किमी का फायबर नेटवर्क बना
महाराष्ट्र में तीन स्मार्ट सिटी पुणे, नाशिक और नागपुर बन रही हैं। नागपुर में पैन सिटी प्रोजेक्ट के तहत अब तक 1045 किलोमीटर का फायबर नेटवर्क किया गया है। 700 चौराहों पर 3600 सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं। कुल 3,355 करोड़ रुपए का प्रोजेक्ट हैं। वहीं पुणे देश में एकमात्र स्मार्ट सिटी है जिसे दूसरे चरण में सौ करोड़ रुपए मिले हैं। पुणे में अब तक कुल 950 करोड़ रुपए की टेंडर प्रक्रिया पूरी कर ली गई है। पुणे स्मर्ट सिटी को अक्टूबर 2019 में कुल छह राष्ट्रीय पुरस्कार मिले। अगस्त 2016 में नाशिक को स्मार्ट सिटी के रूप में चुना गया। 2400 करोड़ रुपए के कुल प्रोजेक्ट हैं। जबकि अब तक 29 करोड़ रुपए के प्राजेक्ट पूरे हुए हैं। जबकि स्मार्ट रोड़, ग्रीन सिटी, प्रोजेक्ट गोदावरी और ग्राम स्थान रीडेवलपमेंट प्रोजेक्ट पर कार्य रुका हुआ है।

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