प्रमोशन में आरक्षण : नेहरू से मोदी तक, 65 साल पुराना यह मुद्दा हमेशा सरकारों को परेशानी में डालता रहा है


नई दिल्ली.7 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट की एक टिप्पणी के बाद 65 साल पुराना मामला फिर से गरमा गया है। सुप्रीम कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा था कि सरकारी नौकरियों में प्रमोशन में आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं है और इसे लागू करना या न करना सिर्फ राज्य सरकारों के विवेक पर निर्भर करता है। कोर्ट की टिप्पणी के बाद केन्द्र सरकार पर पुनर्विचार याचिका का दबाव बढ़ गया है। कांग्रेस के साथ ही सरकार के घटक दलों ने भी भाजपा पर दबाव बढ़ा दिया है। आरक्षण समर्थकों की मांग है कि संविधान की नौंवी अनुसूची में आरक्षण को शामिल कर इस विवाद को हमेशा के लिए खत्म कर दिया जाए। 2018 में भी आरक्षण के मुद्दे को लेकर देश में व्यापक तौर पर बंद व हिंसा हुई थी। इस मुद्दे को लेकर देशभर के कर्मचारी दो पक्षों में बंटे हुए हैं।
8 साल पहले दिसंबर 2012 में पदोन्नति में आरक्षण बिल पर राज्यसभा में वोटिंग होनी थी। तब उत्तर प्रदेश में इस बिल के विरोध में लगभग 18 लाख सरकारी कर्मचारी हड़ताल पर चले गए थे। देश की अधिकांश राज्य सरकारें और केंद्र की सरकार प्रमोशन में आरक्षण के पक्ष में दिखती रही हैं। आरक्षण का यह विवाद इसलिए भी अहम है, क्योंकि यह बिहार चुनाव से ठीक पूर्व खड़ा हुआ है। 2015 के चुनाव के समय भी आरक्षण का विवाद खड़ा हुआ था। तब संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा था कि आरक्षण की समीक्षा होनी चाहिए। इसके बाद विरोधी दलाें ने इसे मुद्दा बना लिया और भाजपा को हर रैली में इस मुद्दे पर सफाई देनी पड़ी थी।
  • 1955की तत्कालीन नेहरू सरकार में संविधान में 77वां संशोधन कर अनुच्छेद 16 में नई धारा 4/ए को जोड़ा गया था। इसी के तहत एससी-एसटी समुदाय को सरकारी नौकरी में वरीयता देते हुए प्रमोशन दिया जा सकता था।
  • 1992में इस व्यवस्था पर तब ब्रेक लगा जब इंदिरा साहनी केस के फैसले सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि, "आरक्षण की व्यवस्था नियुक्ति के लिए है न कि प्रमोशन के लिए' व "रिजर्वेशन कुल भर्ती का 50% से ज्यादा नहीं हो सकता'।
  • 1995में केंद्र ने पदोन्नति में आरक्षण के लिए 82वां संविधान संशोधन किया। इससे राज्य को ऐसा करने का अधिकार हासिल हो गया। 2002 में एनडीए ने 85वां संशोधन कर आरक्षण के लिए कोटे के साथ वरिष्ठता भी लागू कर दी।
  • 2005 में उत्तरप्रदेश की मुलायम सरकार ने प्रमोशन में आरक्षण को रद्द कर दिया। दो साल बाद मायावती सरकार ने वरिष्ठता की शर्त के साथ पदोन्नति में आरक्षण को फिर से लागू कर दिया। हाई कोर्ट में चुनौती मिलने के बाद 2011 में इस फैसले को रद्द कर दिया गया। हालांकि, 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि प्रमोशन में आरक्षण पर कोई रोक नहीं है और राज्य इसे अपने विवेक के आधार पर लागू कर सकते हैं।
इस मुद्दे से जुड़ा वो सबकुछ जो आपको जानना चाहिए
यह विवाद है क्या?
7 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रमोशन में आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं है और राज्य को इसके लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। उत्तराखंड सरकार ने दलील दी थी कि संविधान के अनुच्छेद 16(4) और 16(4-A) में इस आशय के कोई प्रस्ताव नहीं हैं और आरक्षण किसी का मौलिक अधिकार नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने उत्तरांखड सरकार की इस दलील को मानते हुए कहा कि संविधान के ये दोनों अनुच्छेद सरकार को यह अधिकार देते हैं कि अगर उसे लगे कि एससी-एसटीसमुदाय का सरकारी नौकरियों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है तो वह नौकरियों एवं प्रमोशन में आरक्षण देने का कानून बना सकती हैं।
शुरू कहां से हुआ?
उत्तराखंड की सरकार ने 5 सितंबर, 2012 को लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) में असिस्टेंट इंजीनियर (सिविल) के पद पर प्रमोशन के लिए नोटिफिकेशन निकाला। इस नोटिफिकेशन में कहीं भी प्रमोशन में आरक्षण का जिक्र नहीं था। इस नोटिफिकेशन के खिलाफ उत्तराखंड हाईकोर्ट में कई याचिकाएं लगीं जिनमें मांग की गई कि एससी-एसटी को प्रमोशन में भी आरक्षण दिया जाए। इस संबंध में उत्तराखंड सरकार ने नोटिफिकेशन जारी करते हुए कहा था कि उत्तर प्रदेश पब्लिक सर्विसेज (रिजर्वेशन फॉर शेड्यूल्ड कास्ट्स, शेड्यूल्ड ट्राइब्स ऐंड अदर बैकवर्ड क्लासेज) ऐक्ट, 1994 के सेक्शन 3(7)का लाभ भविष्य में राज्य सरकार द्वारा प्रमोशन दिए जाने के फैसलों के वक्त नहीं दिया जा सकता है।
पहले हाईकोर्ट, फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंचा विवाद
टैक्स डिपार्टमेंट में सहायक आयुक्त (असिस्टेंट कमिश्नर) के रूप में तैनात उधम सिंह नगर निवासी ज्ञान चंद ने उत्तरांखड सरकार के इस आदेश के खिलाफ हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अनुसूचित जाति के ज्ञान चंद तब उधम सिंह नगर के खातिमा में तैनात थे। उन्होंने उत्तराखंड सरकार के इस नोटिफिकेशन को रद्द करने की मांग की। उत्तराखंड हाई कोर्ट ने 2019 में राज्य सरकार के 2012 के नोटिफिकेशन को रद्द करते हुए सरकार को वर्गीकृत श्रेणियों का आरक्षण देने का आदेश दिया। उत्तराखंड हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस रमेश रंगनाथन और जस्टिस एनएस प्रधान ने नोटिफिकेशन को रद्द करते हुए कहा था कि अगर सरकार चाहे तो वह संविधान के अनुच्छेद 16 (4A) के तहत कानून बना सकती है। हाई कोर्ट के फैसले के विरोध में कुल 7 पार्टियों ने सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दायर की। पूरा विवाद संविधान के अनुच्छेद 16 की व्याख्या को लेकर हुआ। आर्टिकल 16 का विषय "लोक नियोजन के विषय में अवसर की समानता' है।
सरकार क्या कह रही है?
केंद्र सरकार में सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री थावरचंद गहलोत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश से केंद्र का कोई संबंध नहीं है। 2012 में उत्तराखंड में कांग्रेस की सरकार थी और उस सरकार ने ही यह याचिका दायर की थी। मामले में केंद्र सरकार पार्टी नहीं है।
विपक्ष का रुख क्या है?
कांग्रेस ने स्थगन प्रस्ताव नोटिस देते हुए कहा कि सरकारी सेवाओं में एससी और एसटी आरक्षण को कम नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि यह हमारे देश के पिछड़े समुदायों के लिए विनाशकारी होगा। सरकार कोर्ट के फैसले को पलटकर आरक्षण की व्यवस्था पहले की तरह ही बरकरार रखे।
क्या है अनुच्छेद 16(4) और 16(4-A)
भारत के संविधान का अनुच्छेद 16 अवसरों की समानता की बात करता है। यानी सरकार के पास कोई नौकरी है, तो उस पर सभी का बराबर हक है। जिसके पास योग्यता है, उसे नौकरी दे दी जाएगी। लेकिन संविधान का अनुच्छेद 16(4) इस नियम में छूट देता है कि अगर सरकार को लगे कि किसी वर्ग के लोगों के पास सरकारी नौकरियों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है, तो वो उन्हें आरक्षण का लाभ दे सकती है। अनुच्छेद 16(4-A) राज्य को इस बात की छूट देता है कि वो प्रतिनिधित्व की कमी को दूर करने के लिए अनुसूचित जाति और जनजाति को पदोन्नति में आरक्षण दे।
भास्कर एक्सपर्ट- विराग गुप्ता, वकील सुप्रीम कोर्ट
याचिका विशेष तक ही प्रभावी रहेगा यह आदेश
विराग गुप्ता ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में आरक्षण पर जो फैसला दिया है उसका प्रभाव उत्तराखंड से दायर उस याचिका विशेष तक ही है। पॉलिसी डिसीजन नहीं है। उत्तराखंड मामले में प्रमोशन में आरक्षण की मांग की गई थी। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बावजूद सभी राज्य आरक्षण के बारे में अपना कानून बनाने के लिए स्वतंत्र हैं। क्रीमीलेयर, आरक्षण की अधिकतम सीमा सहित कई महत्वपूर्ण निर्णय सुप्रीम कोर्ट के द्वारा दिए गए हैं। अगर आरक्षण मौलिक अधिकार बन जाएगा तो फिर आरक्षण की व्यवस्था स्थाई तौर पर संविधान की व्यवस्था बन जाएगी। महत्वपूर्ण बात यह है कि विधायिका और नौकरियों में आरक्षण दोनों अलग-अलग हैं। विधायिका में आरक्षण अस्थाई है, जिसे हर 10 साल बाद बढ़ाने के लिए संविधान में संशोधन किए गए हैं। जबकि अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी), अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) को नौकरियों में आरक्षण के लिए कोई समय सीमा निर्धारित नहीं है।

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